शनिवार, 7 जनवरी 2012

कविता समय २०१२ के कवि इब्बार रवि का अभंग राग

मैं मरूँ दिल्ली की बस में
पायदान पर लटक कर नहीं
पहिये से कुचलकर नहीं
पीछे घसिटता हुआ नहीं
दुर्घटना में नहीं
मैं मरूँ बस में खड़ा-खड़ा
भीड़ में चिपक कर
चार पाँव ऊपर हों
दस हाथ नीचे
दिल्ली की चलती हुई बस में मरूँ मैं

इच्छा 


अगर कभी मरूँ तो
बस के बहुवचन के बीच
बस के यौवन और सोन्दर्य के बीच
कुचलकर मरूँ मैं
अगर मैं मरूँ कभी तो वहीं
जहाँ जिया गुमनाम लाश की तरह
गिरूँ मैं भीड़ में
साधारण कर देना मुझे है जीवन

धूमिल का अंतिम अभंग राग


शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

अभंग यानि जो भंग न हो . जीवन और कविता कभी भंग नही होते . जीवन राग को उसके तमाम संवेदनो के साथ कविता ही सहेजती है .इस ब्लॉग पर उन  कविताओ को ही सहेजने का रचनात्मक प्रयास किया जायेगा .मनोज