शनिवार, 3 मार्च 2012

पंकज मिश्र की कविता

पंकज मिश्र की कविता 
मैं, तुम्हारा बाप हूँ 
हाँ ,तो ....?
मैंने, तुम्हे पैदा किया है 
जानता हूँ ,तो...? 
मैंने, तुम्हे पाला पोसा,बड़ा किया है
सच है ,तो.....?
बुढ़ापे में, मैं और तुम्हारी माँ 
कहाँ जायेंगे ,कैसे रहेंगे 
क्या, इसी दिन के लिए,
तुम्हे, पैदा किया 
पाला ...पोसा.....बड़ा किया 
शायद...
मतलब ?
मतलब कि,
आप यही रहेंगे
कही नहीं जायेंगे
मैं भी यही रहूँगा ,
आपके साथ
आप भी यही रहेंगे ,
मेरे साथ 
मैं ,
ये इसलिए नहीं कह रहा
कि,आपने वो सब किया 
जो एक बाप को करना चाहिए 
कि, ये कोई क़र्ज़ है
जो उतरना चाहिए  
कि ये कोई एहसान है
जिसके बोझ तले
मैं दबा हूँ,
जिससे निकलना चाहिए 
मुझे तो, ये करना ही है
कि, ये मेरे लिए
इंसानियत कि शर्त है
कि,ये कोई सौदा नहीं है
और
न ही कोई उधारी......

सिर्फ, इंसानियत ....!
कंपकपाया,पिता का स्वर यन्त्र 

सिर्फ, इंसानियत ....!
कंठ से फूटा हो जैसे मंत्र

सिर्फ, इंसानियत ....!

मैंने सर उठाया
पिता के नेत्रों से 
झर रहा,
ज्यों मंत्र - निर्झर 
झर झर झर 
झर झर झर 
काल कुंठित, प्रौढ़ प्रेत से, पिता लगे 
संबंधों के निर्वात से झांकते, पिता लगे

निष्प्राण निर्वासन झेलता 
बरस बीता ,दशक बीता 
आज भी ,उसी प्रेत बाधा से ग्रस्त
जीवन जी रहा  
मिला पाता आँख 
न,अपने आप से 
न, अपने ही सद्यः जात से
कदाचित, मिल ही गयीं कभी 
देखता हूँ, ज्यों 
काल कुंठित प्रौढ़ प्रेत का
वो मंत्र--निर्झर झर रहा है
और मेरे भीतर कोई बाप
धीरे धीरे मर रहा है .... 

बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

सीधी है भाषा बसंत की 

कभी आँख ने समझी 
कभी कान ने पायी
कभी रोम रोम से 
प्राणों में भर आयी
और है कहानी दिगंत की 

नीले  आकाश में 
नयी ज्योति छा गयी 
कब से प्रतीक्षा थी 
वही बात आ गयी 
एक लहर फैली अनंत की 

'ताप के ताये हुए दिन में' कवि त्रिलोचन का बसंत 

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

महमूद दरवेश की एक कविता 

जब मिटटी थे मेरे शब्द 
मेरी दोस्ती थी गेंहू की बालियों से 

जब क्रोध  थे मेरे शब्द 
जंजीरों से दोस्ती थी मेरी 

जब पत्थर  थे मेरे शब्द 
मैं लहरों का दोस्त हुआ 

जब विद्रोही हुए  मेरे शब्द 
भूचालों से दोस्ती हुई मेरी 

जब कडवे सेब मेरे शब्द 
मैं आशावादियों का दोस्त हुआ 

पर जब शहद बन गये मेरे शब्द 
मख्खियों ने मेरे होंठ घेर लिए .

"पहल" के दरवेश विशेष अंक से 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

लोकेश की कविता

सडकों पे बिकता इंसान
खोलोगे कब लब
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?


शिक्षा की है सजी दुकान
सपनों के महके पकवान
खाली अपनी जेब, ऊँचे उनके दाम
खोलोगे कब लब?
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?


अमरीका से आए डॉलर
सूद-नफे की खाए डॉलर
कंगला हमे बनाए डॉलर
खोलोगे कब लब?
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?


पैसा नहीं तो कर्जा लो
घर बेंचो, खेतों को गिरवी रख दो
पूंजीपतियों की जेबें भर दो
खोलोगे कब लब?
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?
 

लोकेश    lokeshmaltiprakash@gmail.com

लोकेश की कविता


सडकों पे बिकता इंसान
खोलोगे कब लब
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?


शिक्षा की है सजी दुकान
सपनों के महके पकवान
खाली अपनी जेब, ऊँचे उनके दाम
खोलोगे कब लब?
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?


अमरीका से आए डॉलर
सूद-नफे की खाए डॉलर
कंगला हमे बनाए डॉलर
खोलोगे कब लब?
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?


पैसा नहीं तो कर्जा लो
घर बेंचो, खेतों को गिरवी रख दो
पूंजीपतियों की जेबें भर दो
खोलोगे कब लब?
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?


लोकेश  lokeshmaltiprakash@gmail.com

शनिवार, 7 जनवरी 2012

कविता समय २०१२ के कवि इब्बार रवि का अभंग राग

मैं मरूँ दिल्ली की बस में
पायदान पर लटक कर नहीं
पहिये से कुचलकर नहीं
पीछे घसिटता हुआ नहीं
दुर्घटना में नहीं
मैं मरूँ बस में खड़ा-खड़ा
भीड़ में चिपक कर
चार पाँव ऊपर हों
दस हाथ नीचे
दिल्ली की चलती हुई बस में मरूँ मैं

इच्छा 


अगर कभी मरूँ तो
बस के बहुवचन के बीच
बस के यौवन और सोन्दर्य के बीच
कुचलकर मरूँ मैं
अगर मैं मरूँ कभी तो वहीं
जहाँ जिया गुमनाम लाश की तरह
गिरूँ मैं भीड़ में
साधारण कर देना मुझे है जीवन

धूमिल का अंतिम अभंग राग


शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।