रविवार, 5 फ़रवरी 2012

महमूद दरवेश की एक कविता 

जब मिटटी थे मेरे शब्द 
मेरी दोस्ती थी गेंहू की बालियों से 

जब क्रोध  थे मेरे शब्द 
जंजीरों से दोस्ती थी मेरी 

जब पत्थर  थे मेरे शब्द 
मैं लहरों का दोस्त हुआ 

जब विद्रोही हुए  मेरे शब्द 
भूचालों से दोस्ती हुई मेरी 

जब कडवे सेब मेरे शब्द 
मैं आशावादियों का दोस्त हुआ 

पर जब शहद बन गये मेरे शब्द 
मख्खियों ने मेरे होंठ घेर लिए .

"पहल" के दरवेश विशेष अंक से 

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