शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

लोकेश की कविता

सडकों पे बिकता इंसान
खोलोगे कब लब
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?


शिक्षा की है सजी दुकान
सपनों के महके पकवान
खाली अपनी जेब, ऊँचे उनके दाम
खोलोगे कब लब?
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?


अमरीका से आए डॉलर
सूद-नफे की खाए डॉलर
कंगला हमे बनाए डॉलर
खोलोगे कब लब?
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?


पैसा नहीं तो कर्जा लो
घर बेंचो, खेतों को गिरवी रख दो
पूंजीपतियों की जेबें भर दो
खोलोगे कब लब?
अरे अब नहीं तो कब हो बहना...अब नहीं तो कब?
अब नहीं तो कब हो भैया...अब नहीं तो कब?
 

लोकेश    lokeshmaltiprakash@gmail.com

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें